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पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान पर आधारित मधुमेह पर वैज्ञानिक रपट


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मधुमेह से सम्बन्धित पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान पर आधारित वैज्ञानिक रपट मे प्रगति

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पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान पर आधारित मधुमेह पर वैज्ञानिक रपट

आपके प्रश्न मेरे उत्तर

पंकज अवधिया

प्रश्न: मधुमेह पर वैज्ञानिक रपट लिखने का विचार आपके मन मे कैसे आया?
मै एक दशक से भी अधिक समय से पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान का दस्तावेजीकरण शोध पत्रो और शोध आलेखो के माध्यम से कर रहा हूँ। पर इन माध्यमो से विस्तार पूर्वक जानकारी उसके मूल स्वरूप मे दे पाना सम्भव नही था। इसलिये इसे एक अलग रपट के रूप मे इसे लिखने का विचार आया।

प्रश्न :पूरी दुनिया मे इससे पहले इतने विस्तार से मधुमेह के उपचार के बारे मे क्यो नही लिखा गया?
यह तो मै नही बता पाऊंगा कि पहले क्यो नही विस्तार से सब कुछ लिखा गया पर हम भारतीय सौभाग्यशाली है कि यह ज्ञान अभी भी पारम्परिक चिकित्सको के पास है। मैने अब तक 65,000 पन्ने लिखे है जिसमे 55,000 तो तालिकाए ही है। यह लेखन आठ महिनो का प्रयास है। पूरी रपट तीन लाख पन्नो की होने की सम्भावना है। मुझसे जितना बन पडा मैने जानकारियाँ एकत्र की और इसमे सम्मलित की पर अभी भी जो ज्ञान इस रपट के रूप मे सामने आ रहा है वह सागर मे एक बूंद के समान है। एक पूरी पीढी को आगे आकर इसका दस्तावेजीकरण करना होगा तभी बात बन पायेगी। हमारे बीच से पारम्परिक चिकित्सक लगातार कम होते जा रहे है। उनकी नयी पीढी इसमे रूचि नही दिखा रही है। यह शुभ संकेत नही है। ऐसा न हो कि जब तक हम इनके ज्ञान के महत्व को समझे तब तक देर हो चुकी हो। देश के विभिन्न हिस्सो मे वानस्पतिक सर्वेक्षणो के दौरान मै हजारो पारम्परिक चिकित्सको से मिला। उनमे से कई अब दुनिया मे नही है। यह ठीक है कि उनका ज्ञान मेरे आलेखो मे है पर वे आधुनिक समाज से मान्यता पाये बिना ही चले गये। यदि हमारा समाज उनका महत्व समझता तो आज नयी पीढी इस ज्ञान से रोगियो का भला कर रही होती।

प्रश्न: यह रपट कहाँ उपलब्ध है?
यह रपट इकोपोर्ट नामक डेटाबेस पर है। प्रतिदिन आँन-लाइन इसमे नयी जानकारियाँ जोडी जा रही है। रपट पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें!

प्रश्न: आपने इसे शोध-पत्र के रूप मे क्यो नही प्रकाशित करवाया?
शोध-पत्र के रूप मे तो नही पर इसे शोध ग्रंथ के रूप मे प्रकाशित किया जा सकता है। पर जानकारी का विस्तार देखते हुये इसे आन-लाइन पढना ही आसान होगा। विश्वविद्यालयो मे तो इसे प्रकाशित करने से पहले इसमे फेर-बदल किया जायेगा। भाषा को सुधारने की जद्दोजहद होगी। मै इसे अपने मौलिक रूप मे प्रकाशित करवाना चाहता हूँ। यदि कोई संस्थान इसके लिये तैयार होता है तो स्वागत है।

प्रश्न: यह कब तक पूरी होगी?
अभी प्रतिदिन औसतन 14 घंटे इस पर काम हो रहा है। यदि यही गति रही तो वर्ष 2009 के अंत तक यह रपट पूरी हो पाने की सम्भावना है।

प्रश्न: इस रपट के प्रायोजक कौन है?
यह अहम प्रश्न है पर इसका जवाब अच्छा नही है। ज्ञान के एकत्रीकरण से लेकर अब जबकि हजारो पन्ने लिखे जा चुके है, सारा कार्य निज व्यय से हो रहा है। यदि प्रायोजको की प्रतीक्षा की जाती तो जाने कितने साल लगते और कितने सही-गलत समझौते करने पडते। प्रायोजक चाहते है कि वे सारे राज जाने और ज्ञान को अपनी सुविधानुसार प्रयोग भी करे। यह पारम्परिक चिकित्सको और देशज ज्ञान के लिये हितकर नही होगा इसीलिये बिना प्रायोजक के यह कार्य जारी है। इकोपोर्ट ने जगह उपलब्ध करवायी है और अपने नियमो के अनुसार वह इसकी कानूनी रक्षा भी कर रहा है। देशी डेटाबेसो ने तो अब तक कोई पहल नही की है।

प्रश्न: आपके सहायको और कम्प्यूटर आपरेटरो का खर्च कैसे निकलता है?
प्रायोजक न होने के कारण सहायको और कम्प्यूटर आपरेटरो की सेवाए ले पाना सम्भव नही है। सारे कार्य मै ही करता हूँ। इससे एक लाभ यह होता है कि किसी भी तरह से हो रही गल्ती तुरंत ही सुधार ली जाती है।

प्रश्न: आपने तो कृषि की शिक्षा ली है फिर इस तरह का दस्तावेजीकरण का कार्य आप कैसे कर पाते है?
शुरू मे कुछ झिझक थी पर बाद मे जब मैने देखा कि मेरे आरम्भिक लेख दुनिया भर मे गहन शोधो के लिये उपयोग किये जा रहे है तो हौसला बढा और मैने उद्दाम वेग से लिखना आरम्भ कर दिया। आज दुनिया भर के हजारो शोधकर्ता मेरे दस्तावेजो को उच्च शिक्षा मे प्रयोग कर रहे है। इससे बढकर संतोष की और क्या बात हो सकती है।

प्रश्न: क्या आपकी रपट मे चित्रो का भी समावेश किया गया है?
अभी रपट मे 80,000 चित्र शामिल किये गये है। इनमे से 30,000 चित्रो को इकोपोर्ट पर डाला जा चुका है। ये चित्र रपट को जमीनी स्तर पर उपयोगी बना देंगे।

प्रश्न: क्या इसमे मधुमेह के बारे मे पूरी जानकारी है?
जैसा कि मैने पहले कहा कि एक अकेले के बस मे सब कुछ लिख पाना सम्भव नही है। भले ही आगामी वर्षो मे यह रपट पूरी मान ली जायेगी पर आगे आने वाले लोग इसमे कुछ न कुछ अपने अनुभव से जोडेंगे और इस तरह इस मायने मे यह कभी भी पूरी नही होगी। अभी इस रपट मे मधुमेह की सभी अवस्थाओ और उसके साथ 50 से अधिक प्रकार के रोगो जिनमे ह्रदय, श्वाँस, यकृत आदि से सम्बन्धित रोग शामिल है, के पारम्परिक उपचार के विषय मे जानकारी उपलब्ध करायी गयी है।

प्रश्न: क्या इस रपट की सहायता से कोई भी उपचार कर सकता है?
यह रपट तकनीकि भाषा मे लिखी जा रही है। वैसे भी मधुमेह जैसे जटिल रोग के स्व-उपचार का मै पक्षधर नही हूँ। विशेषज्ञो के मार्गदर्शन मे ही औषधीयो का प्रयोग करना चाहिये।

प्रश्न: इस रपट को अभी क्यो नही पढा जा सकता?
अभी रपट पर काम चल रहा है। स्व-उपचार और बहुराष्ट्रीय कम्पनियो से बचाने के उद्देश्य से इसके ज्यादातर भागो को कूट (कोड) मे लिखा गया है और इसका तोड (डिकोडिंग) मेरे पास है। रपट पूरी होने के बाद भारतीय विशेषज्ञो के लिये इसे उपलब्ध कराया जायेगा जो कि राष्ट्रीय जैव-विविधता बोर्ड के नियमानुसार पारम्परिक चिकित्सको के हितो को ध्यान मे रखते हुये आगे के लिये मार्ग प्रशस्त करेगा।

प्रश्न: क्या दुनिया भर के शोध संस्थान इसमे रूचि दिखा रहे है?
हाँ, दुनिया भर की नजर इस रपट पर गडी हुयी है और देशी-विदेशी संस्थान इसमे रूचि दिखा रहे है। पर बहुत कम संस्थान पारम्परिक चिकित्सको के हितो की बात कर रहे है। यह विडम्बना ही है कि जिनके ज्ञान के आधार पर तैयार की गयी रपट पर वे फिदा है उन्ही पारम्परिक चिकित्सको को अपने देश मे नीम-हकीमो का दर्जा प्राप्त है।

प्रश्न: आपको इस रपट से क्या आशाए है?
आम तौर पर पारम्परिक चिकित्सक किसी से ज्ञान बाँटते नही है। मै अपनी क्षमता के अनुसार उनसे मिला और बातचीत मे जो उन्होने बताया उसी के आधार पर इतना सब लिख रहा हूँ। आप कल्पना करिये कि जब ये प्रकृति पुत्र अपने आप आगे आकर अपना ज्ञान पूरी दुनिया के लिये उपलब्ध करवायेंगे तो कितनी सारी जनकारियाँ सामने आयेंगी। चूँकि मै सालो तक अलग-अलग पारम्परिक चिकित्सको से मिलता रहा और उनके बीच सेतु की तरह कार्य करता रहा इसीलिये रपट मे काफी कुछ मेरे इन्ही अनुभवो पर आधारित है। दस्तावेजीकरण के वर्तमान नियम पारम्परिक चिकित्सको के हितो की बात तो करते है पर दस्तावेजीकरण करने वालो के लिये कुछ नही कहते है। उन्हे तो सदा ही शक की नजर से देखा जाता है। मैने तो अपने खर्च पर यह कार्य कर लिया पर यही रवैया रहा तो आने वाले युवा यह काम कभी नही करना चाहेंगे। कोई इस विषय मे पढना भी नही चाहेगा। मुझे लगता है कि सरकार को आगे आकर दस्तावेजीकरण के कार्य को मुख्य धारा मे लाना होगा। ध्वज लेकर सामने चलने वाले को तो कष्ट ही मिलता है। इसीलिये मुझे व्यवस्था से शिकायत नही है।

इस रपट मे लिखे उपचार आम जन तक एक दशक के बाद ही पहुँच पायेंगे क्योकि रपट पूरी होने के बाद आधुनिक चिकित्सक पहले प्रयोगशाला जीवो और फिर मनुष्यो पर परीक्षण करेंगे। फिर यह आम जनता के लिये अनुमोदन के रूप मे उपलब्ध होगा। यदि यह प्रक्रिया जल्दी ही आरम्भ हो तो सबके लिये हितकर होगा।

प्रश्न: आपकी भविष्य के लिये क्या योजनाए है?
इस रपट के बाद कैसर और ह्रदय रोगो पर रपट तैयार करने की योजना है। ये रपटे मधुमेह की इस रपट से कही बडी होंगी।

प्रश्न: क्या इस रपट मे किसानो के लिये भी कुछ है?
इस रपट मे बहुत सी ऐसी वनस्पतियो का वर्णन है जिनकी उपलब्धता वनो मे घटती जा रही है। यदि इस रपट पर अमल हुआ तो भारतीय किसानो को इन वनस्पतियो की परम्परागत ढंग से खेती करने का अवसर मिलेगा। इस रपट मे 60 से अधिक विधियो से मेथी उगाने के बारे मे बताया गया है। इस विषय मे अधिक जानकारी के लिये मेरा लेख चलिये अब मेथी उगाये डायबीटीज के लिये पढ़ें।

प्रश्न: इसे हिन्दी मे क्यो नही लिखा जा रहा है?
मेरी बडी इच्छा थी कि इसे हिन्दी मे ही लिखा जाये पर रपट आरम्भ करते समय मुझे हिन्दी मे टाइप करना नही आता था। अभी भी धीरे-धीरे ही लिख पाता हूँ। फिर इकोपोर्ट हिन्दी मे इसे स्वीकार नही करता। इस रपट मे बहुत अधिक तकनीकी शब्द है जिसके लिये हिन्दी शब्द खोज निकालना भी मुश्किल लग रहा है। पर यदि कोई इसके लिये सामने आये तो स्वागत है।

इस रपट के विषय मे नयी जानकारियो के लिये इन ब्लागो मे समय-समय पर आते रहें:

मधुमेह पर वैज्ञानिक रपट : कुछ झलकिया

हमारा पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान

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