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पैसे से खरीदकर रोज जहर खाता है आम भारतीय

हिन्दी वेबसाइट में पंकज अवधिया के लेख
पंकज अवधिया

यदि आप से पूछा जाये कि आप एक ऐसा दिन बताइये जिस दिन आपने कीटनाशक मुक्त खाद्य पदार्थ खाया था तो आप असमंजस मे पड जायेंगे। आपमे से बहुत से यह कहेंगे कि हम तो रोज ही कीटनाशक मुक्त भोज्य पदार्थ खाते है और कुछ यह भी कहेंगे कि यह तो बडा मुश्किल प्रश्न है। पर मेरा आँकलन है कि एक भारतीय परिवार रोज दिन मे कई बार जाने और अनजाने रूप मे कीटनाशक युक्त भोज्य पदार्थो का सेवन करता है। कैसे? चलिये दिन की शुरूआत से बात करते है।

आप सुबह उठे और आपने चाय पी। बतौर सलाहकार साल मे कई बार मेरा चाय बागानो मे जाना होता है। फिल्मो मे तो चाय बागान बडे मोहक दिखते है पर असल मे चाय बागानो मे बडी मात्रा मे कीटनाशको का प्रयोग किया जाता है। बागानो के बीच से आप गुजरेंगे तो आपको नाक मे रूमाल रखना होगा। उनकी भी मजबूरी है। लम्बे समय तक एक ही तरह की फसल लेने और कीटनाशको के लगातार प्रयोग से कीडे मजबूत प्रतिरोधक क्षमता वाले हो गये है। अब उन्हे मारने के लिये तेज क़ीटनाशको का प्रयोग होता है। कीटनाशको के अवशेष उस चाय मे भी होते है जिसे हमारा परिवार सुबह शाम-पीता है। आपने चाय मे शक्कर डाली नही कि कीटनाशक का दूसरा स्त्रोत सामने आ गया। शक्कर गन्ने से बनती है और हमारे देश मे इसकी खेती आधुनिक तरीके से होती है। जम के रासायनिक आदानो का उपयोग होता है अच्छे उत्पादन के लिये। शक्कर मे भी इनके अवशेष होते है। हम बच्चो को नूडल्स या कार्न फ्लेक्स देते है उनमे प्रयोग होने वाले घटक मुख्यतया गेहूँ और मक्का रासायनिक खेती से ही उत्पादित होते है। इसी तरह आपने ने नाश्ते मे पोहा या हलवा खाया तो वे भी कीटनाशको से मुक्त नही है। गेहूँ और मक्के की तरह धान की खेती भी कीटनाशको की सहायता से होती है। देश के कई हिस्सो मे तो किसान अपने मन से विभिन्न कीटनाशको को मिलाकर प्रयोग कर रहे है। उन्हे तो किसी भी कीमत पर कीडो से सुरक्षा चाहिये। हाँ यह अलग बात है कि बहुत से किसान अपने लिये जो अन्न उगाते है उसमे वे कीटनाशको का प्रयोग नही करते है। सब्जियो और फलो मे कीटनाशक होते है यह बात तो हम सब जानते है। गृहणियाँ यह मानकर खुश हो जाती है कि अच्छे से धो लेने से सब्जियाँ कीटनाशक मुक्त हो जाती है पर हकीकत यह नही है। आजकल प्रयोग किये जा रहे ज्यादातर कीटनाशक ऐसे है जो पौधो के अन्दर रहते है और पानी से नही धुलते है। इन खतरो को जानते हुये वैज्ञानिक सलाह देते है कि कीटनाशक के प्रयोग के महिने भर बाद ही सब्जियाँ बेचे पर आजकल तो इनकी अनदेखी कर कुछ ही दिनो बाद सब्जियाँ बाजार मे पहुँचा दी जाती है। रोटी से लेकर चावल तक कीटनाशक से भरे है। भोजन के बाद आपने सौफ, लौंग या इलायची खायी तो वे भी कीटनाशकयुक्त है।

पानी तो आप घर मे फिल्टर कर लेते है पर बहुत सी जगहो मे भूमिगत जल का प्रयोग होता है। वहाँ आस-पास खेतो मे डाला जाने वाला क़ीटनाशक भूमिगत जल मे मिल जाता है और अनजाने ही लोगो के शरीर मे पहुँच जाता है। हमारे पानी साफ करने वाले फिल्टर कीटनाशको को नही छान पाते। इसीलिये वे अपने विज्ञापन मे भी यह बात नही कहते है। यहाँ मैने कीटनाशक शब्द का प्रयोग किया है क्योकि आम लोग इससे परिचित है पर सही शब्द कृषिरसायन है। इसमे उर्वरक, रोगनाशक, कीटनाशक, वृद्धि बढाने वाले रसायन, खरपतवार नाशक आदि आते है। ये आधुनिक कृषि के औजार है। वैसे कई तरह के नुकसान दायक रसायनो का प्रयोग तो हम दैनिक जीवन मे करते ही है। आप जो दूध पीते है उसके उत्पादन को बढाने के लिये पशुओ को रसायनो के इंजैक्शन दिये जाते है। हाल ही मे प्रकाशित रपट बताती है कि ये रसायन पशुओ के शरीर मे रह जाते है और उनकी मृत्यु के बाद उन्हे खाने वाले गिद्धो के शरीर मे पहुँच कर उनकी किडनी खराब कर देते है। यही कारण है कि गिद्ध तेजी से विलुप्त होते जा रहे है। जो रसायन गिद्धो के लिये जानलेवा साबित हो रहे है वे आपके शरीर मे क्या कहर बरपा रहे होंगे यह कल्पना से बाहर है। बालो के लिये प्रयोग किये जाने वाले नारियल तेल से लेकर साबुन मे जहरीले रसायन है। चोट मे लगाने के काम आने वाली रूई मे भी कीटनाशक है।

क्या कभी आपने इस बात पर गौर किया है कि चिकित्सा सुविधा और आम लोगो की आय इतनी अधिक बढ जाने के बाद भी रोग कम नही हुये है। हमारी आय का एक बहुत बडा हिस्सा रोगो से मुक्ति पाने मे खर्च हो रहा है। असमय बुढापा आ रहा है, छोटे बच्चे अस्थमा का इनहेलर उपयोग कर रहे है। कैसर जैसे रोग तो हर दसवे घर को शिकार बनाने लगे है। यदि विशेषज्ञो की माने तो हमारे जीवन मे कीटनाशको की इतनी बडी मात्रा मे घुसपैठ इसके लिये काफी हद तक जिम्मेदार है। आप रोगो से तो लड रहे है पर रोग उत्पत्ति के कारणो की अनदेखी कर रहे है। आखिर कब तक आप इस बडे खतरे की अनदेखी करते रहेंगे?

आज मुश्किल इस बात की है कि हम अपनी शिक्षा के दम पर समस्या को तो जानते है पर उससे बचने या निपटने के उपायो को नही जानते। मै मानता हूँ कि डराना बहुत आसान है पर उपाय सुझाना बडा मुश्किल। मेरा यह प्रश्न है कि जब इतने बडे पैमाने पर खुल्लमखुल्ला कीटनाशक हमारे शरीर मे जा रहे है तो इसे रोकने के लिये हम सब एक स्वर मे आवाज क्यो नही उठाते? क्यो कभी यह चुनावो मे मुख्य मुद्दा नही बनता है? यह तो सडक और बिजली से पहले की समस्या है। यह लापरवाही पूरी पीढी को विनाश के कगार पर ले जा रही है।

चलिये अब समस्या की जड तक जाये और किसानो से पूछे कि आप जैविक खेती क्यो नही करते? वे हमसे ही प्रश्न पूछेंगे कि हम जैविक खेती करेंगे पर आप बताओ तो कैसे करे? इस उत्तर के बाद जब आप कृषि शोध संस्थानो का रूख करेंगे तो वे आपको हजारो दस्तावेज दिखा देंगे कि कैसे उनके द्वारा विकसित जैविक खेती की तकनीक से सफल खेती की जा सकती है। आप फूले नही समायेंगे पर आप जब किसानो को यह बतायेंगे तो वे झट से बोलेंगे कि उनकी तकनीक कागजो तक ही सीमित है। खेत स्तर पर उसका महत्व ही नही है। हमारे ज्यादातर शोध संस्थान तो कृषि रसायनो पर प्रयोग करते है क्योकि इसके लिये उन्हे सहायता भी मिलती है। तब फिर किसान क्या करे? चलिये हमारे किसान फिर भी तैयार है। वे अपने बुजुर्गो की खेती जो कि जैविक खेती थी को फिर से शुरू करने को तैयार है। पर आज के मजबूत कीटो के आगे यह खेती उत्पादन मे कमी ला सकती है। इस कमी की भरपाई उत्पाद की अधिक कीमत से हो सकती है। पर जैसे ही उत्पाद महंगा होगा चारो ओर हल्ला मचेगा कि महंगाई बढ गयी है और सरकार डोलने लगेगी। तो फिर कैसे हो पायेगा बचाव? आप भी विचारिये।

मेरा मानना है कि पहले तो कीटनाशक से हो रहे नुकसान के विषय मे सभी को बताया जाये और उनसे एकजुट होने को कहा जाये। फिर कुछ वर्षो तक महंगा पर विषमुक्त अन्न खाया जाये। इस बीच शोध संस्थानो को जमीनी स्तर के प्रयोग के लिये प्रेरित किया जाये। आठ से दस वर्षो मे कुछ बात बनती नजर आयेगी।

पता नही आपमे से कितने लोग अब भी इस विषय को गम्भीरता से ले रहे है पर मुझे लगता है कि समय-समय पर समाज के अलग-अलग मंच से यह बात अब उठानी ही होगी। पता नही नेताओ के कान मे कब जूँ रेंगेगी? अभी तो देश की जनता को आयातित गेहूँ खाना है जिसमे बडी मात्रा मे नाना प्रकार के कीटनाशक है। इतनी बडी मात्रा कि एक पूरी पीढी को रोगग्रस्त कर दे। आप तैयार है न?

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

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