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अपने ही देश मे क्यो दुत्कारी जा रही पारम्परिक चिकित्सा पद्धति?
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अपने ही देश मे क्यो दुत्कारी जा रही पारम्परिक चिकित्सा पद्धति?

हिन्दी वेबसाइट में पंकज अवधिया के लेख
पंकज अवधिया

प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक पंकज अवधिया का चिट्ठा
दर्द हिन्दुस्तानी

कुछ दिनो पहले मेरे मित्र की माताजी को सिर पर चोट लग गयी। चोट मामूली थी पर फिर भी मित्र को लगा कि डाक्टर को दिखा दे। डाक्टर ने जाँच की और कहा कि सब ठीक है पर चाहे तो सिटी स्केन करा ले। मित्र ने यह भी करा लिया। सिटी स्केन की रपट देने वाले डाक्टर ने कहा सब कुछ सही है। फिर उस डाक्टर के पास वह गया जिसने इसकी सिफारिश की थी। उसने बिना रपट देखे कहा सब ठीक है। बात आयी-गयी हो गयी। एक नजदीकी रिश्तेदार ने कहा कि सिर का मामला है, किसी और को भी दिखा लो। एक नये डाक्टर के पास गये। उसने रपट देखी और कहा कि दिमाग मे सूजन है। ग्लिसराल नामक दवा पीने को दी गयी। आमतौर पर एक चम्मच ग्लिसराल दी जाती है एक दिन मे। पर इस डाक्टर ने तो एक दिन मे पूरी शीशी पिला दी। दवा उसकी अपनी दवा दुकान से दिलवायी गयी। तीन दिन मे तीन शीशी। फिर सिटी स्केन कराने को कहा। इस बार दूसरी जगह से सिटी स्कैन कराने कहा। फिर रपट आयी तो कहा कि एक न्यूरो सर्जन से मिल लो। उसने फिर सिटी स्केन के लिये कहा। अब तो हद हो गयी। मित्र थक गया। लोगो ने उसे इस फन्दे से बचाया कि पहले मन से डर निकालो और घरेलू दवा के रूप मे दूध हल्दी पियो और वो भी यदि दर्द हो तो। बस फिर क्या था कुछ ही दिनो मे माताजी चंगी हो गयी। इस तरह की घटना भले ही मित्र के लिये नयी हो पर हम आप तो रोज ऐसे किस्से सुनते रहते है जहाँ एक बार फन्दे मे फँसने पर भयादोहन कर जब तक सम्भव हो चिकित्सा के नाम पर पैसे ऐठे जाते है। दवाए इतनी महंगी है और इलाज भी सबके बूते की बात नही है। हमारा आधुनिक जीवन हमे रोगो के पास ले जा रहा है और रोग का इलाज उनके पास है जो येन-केन-प्रकारेण पैसे कमाने की फिराक मे है। मुझे डिस्कवरी चैनल मे दिंखाये जाने वाले आफ्रीका के उन वन्य पशुओ का ख्याल आता है जिनका प्यास से बुरा हाल होता है और पास के पोखर मगरमच्छो से भरे होते है। पशु फिर भी पानी पीने जाते है और धर लिये जाते है। उनकी मजबूरी आज के बीमार आदमी की मजबूरी जैसी ही है।

जब मै सुदूर अंचलो मे जाता हूँ वानस्पतिक सर्वेक्षणो के लिये तो मुझे ऐसे लोग मिलते है जो कि अपने पारम्परिक ज्ञान के आधार पर आस-पास उपलब्ध वनस्पतियो से रोगियो को आराम पहुँचाते है। चूँकि यहाँ डाक्टर नही होते है इसलिये रोगी इन पर ही निर्भर रहते है। हम इन्हे पारम्परिक चिकित्सक के नाम से जानते है। इनमे से ज्यादातर लोग चिकित्सा के पैसे नही लेते है। कुछ लेते है तो केवल वनस्पतियो की कीमत, वह भी चन्द रुपयो मे। उन्हे चेताया गया है कि इस ज्ञान से अर्थ लाभ किया तो सदा के लिये इसे खो बैठोगे। पर ठहरिये अगर आप भारतीय कानून को मानते है तो इनसे दूर रहे। क्यो? क्योकि हमारा कानून इनको नीम-हकीम कहता है। इन्हे इलाज करने की छूट नही है। भले ही विदेशो से वैज्ञानिक आये और इनके ज्ञान के आधार पर दवा बनाकर पेटेंट कराये पर इन पारम्परिक चिकित्सको को यह करने की छूट नही है। मुझे यह बडी अजीब से स्थिति लगती है। अपनी संस्कृति और विरासत पर नाज करने वाला हमारा देश यह क्या कर रहा है? विदेशी चिकित्सा पद्धति को इतना बढावा और देशी चिकित्सा पद्धति से इतना बैर कि उसे कानूनी मान्यता ही नही। मै असमंजस मे हूँ।

आजादी के बाद पडोसी देश चीन मे इस पर बह्स हुयी कि नंगे पाँव देशी चिकित्सको का क्या भविष्य हो। वहाँ योजनाकारो ने उन पर प्रतिबन्ध लगाने की बजाय उनको प्रोत्साहित करने का निर्णय लिया। इसके दूरगामी परिणाम हुये। आज चीनी दवाये दुनिया भर मे नम्बर वन है। चीनी पारम्परिक चिकित्सको का पूरी दुनिया मे बोलबाला है। इन दवाओ से न केवल करोडो चीनीयो को स्वास्थ्य लाभ मिलता है बल्कि इससे देश को बहुत आय भी होती है। ऐसा हमारे देश के योजनाकारो ने क्यो नही किया- इस पर लम्बी बहस हो सकती है। हम राजनीति कर सकते है। किसी पार्टी विशेष को दोषी ठहरा सकते है पर अब भी जो वयोवृद्ध पारम्परिक चिकित्सक समाज से आदर और सम्मान की बाट जोह रहे है उनके लिये कुछ नही करते है। ये शर्म की बात नही तो और क्या है?

मैने इन पारम्परिक चिकित्सको के विषय मे बहुत कुछ लिखा है। हजारो शोध आलेख इंटरनेट पर है। इन लेखो के आधार पर दुनिया भर मे शोध हो रहे है। दुनिया भर के लोग छत्तीसगढ और भारत के अन्य भागो के पारम्परिक चिकित्सको के ज्ञान के आगे नतमस्तक है। पर फिर भी ‘घर का जोगी जोगडा और आन गाँव का सिद्ध’ की तर्ज पर हम सब कुछ जानकर भी इनसे पर्दा किये बैठे है। ऐसा ही चलता रहा तो वे तो जल्दी ही हमारे बीच से चले जायेगे पर हमारी आगामी पीढी को मगरमच्छो से भरे पोखरो की ओर बढने से कोई नही रोक पायेगा।

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

© सर्वाधिकार सुरक्षित

Comments

ज्ञान दत्त पाण्डेय
20 Mar 2008, 04:11
कहीं कुछ न कुछ नियम बद्ध करने और रेग्यूलेट करने की आवश्यकता है। पुरातन और नवीन का जबरदस्त सिनर्जिक मेल चाहिये पारम्परिक चिकित्सा को प्रोमोट करने के लिये। शायद जो करेगा, वह पुण्य कमायेगा और पैसा भी।
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