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आपको स्वस्थ बनाने बाट जोह रहे है देशी फल
 पंकज अवधिया
कुछ वर्षो पहले मै गर्मियो के दिनो मे पीले पलाश की तलाश मे वनो मे घूमने निकल्ने की तैयारी कर रहा था। साथ मे चल रहे मार्गदर्शक जो पारम्परिक चिकित्सक भी थे, ने बहुत से तेन्दु के फल एकत्र कर लिये। मैने उनसे कारण पूछा तो वे बोले कि यह तो जंगल के अन्दर जाने पर ही बताऊँगा। हम लोग काफी देर तक चलते रहे। बीच-बीच मे मै अपनी बोतल से पानी पीता रहा और फिर पानी खत्म हो गया। गर्मियो मे जंगल मे पानी मिलना मुश्किल होता है और मिल भी जाये तो वन्य पशुओ के साथ कतार मे लगना पडता है। यहाँ तेन्दु की उपयोगिता पता चली। रास्ते भर मार्गदर्शक ने पानी नही पीया सिर्फ रूककर तेन्दु खाते रहे। उन्हे बिल्कुल प्यास नही लगी। उन्होने खुलासा किया कि शहर के लोग शीतल पेय़ पीकर जो स्वास्थ्य को खतरे मे डालते है और फिर भी गर्मी से नही बच पाते है, के लिये तेन्दु एक सशक्त विकल्प है। यह सस्ता है और स्वादिष्ट भी। बचपन मे गाँवो मे रहकर हमने खूब तेन्दु खाये है पर हमारे आस-पास ऐसे लोग भी है जिनका जीवन शहर मे कटा है और वे तेन्दु जैसे देशी फलो को नही जानते। खाने की बात तो दूर है। मार्गदर्शक महोदय ने बताया कि तेन्दु के प्रयोग से गर्मियो की बीमारियो से बचा जा सकता है। एक शहर से दूसरे शहर जाने से पानी बदलने के कारण होने वाली समस्याओ से भी यह बचाता है, बिल्कुल अदरक की तरह।
आजकल पथरी के रोगी बढते जा रहे है। सन्दर्भ ग्रंथ कहते है कि तेन्दु के फलो का सेवन न केवल इस रोग का उपचार करता है बल्कि फिर से पथरी बनने को रोकता है। खून की सफाई करने का दावा करने वाले ढेरो उत्पाद आज बाजार मे है। हमारे युवा बरसो से इनका उपयोग कर रहे है पर कम ही लाभांवित हो रहे है। तेन्दु मे दूषित खून के कारण होने वाले बीमारियो को जड से दूर करने की ताकत है।
तेन्दु की तरह एक और देशी फल कैथा के विषय मे भी शहरो मे कम जानकारी है। हमारे प्राचीन चिकित्सा ग्रंथ इस फल के औषधीय गुणो के बखान से भरे पडे है। ठंड की बीमारियो के लिये यह एक बहुत उपयोगी औषधी है। सर्दी-खाँसी मे यह आधुनिक दवाओ का सस्ता पर प्रभावी विकल्प साबित होता है। माँ प्रकृति अपने बच्चो को जानती है। इसलिये उन्होने सर्दी के लिये अपने बच्चो की रक्षा के लिये कैथा का फल उपलब्ध करवाया है। पर उनके बच्चे इस ओर ध्यान नही दे रहे है। कैथा हाथी के प्रिय फलो मे से एक है। इसलिये जिन भागो मे हाथी समस्या पैदा करते है (या कहे कि जहाँ आदमी हाथियो के क्षेत्र मे अतिक्रमण करते है) वहाँ मानव आबादी से इन्हे दूर रखने के लिये कैथा के जंगल लगाने की सलाह दी जाती है ताकि उनकी भूख वही मिट जाये।
शहरो मे अंजीर बडे चाव से खायी जाती है। यह महंगी तो होती है पर दिव्य गुणो से युक्त नही होती है। शहरी माँग को पूरा करने के लिये इसे उगाया जाता है। अच्छी फसल के लिये रसायनो का प्रयोग किया जाता है और यही रसायन इसे खाने वालो के लिये अभिशाप बन जाते है। अंजीर का वैज्ञानिक नाम फाइकस कैरिका है। इसका देशी विकल्प हमारे बीच गूलर या डूमर के रूप मे उपलब्ध है। इसे इंडियन फिग का नाम मिला है और इसका वैज्ञानिक नाम है फाइकस रेसीमोसा। इसमे अंजीर जैसे ही गुण पाये जाते है। यह अपने आप उगता है और रसायनो का प्रयोग इसके उत्पादन मे नही होता है। यह बहुत ही स्वादिष्ट होता है। बच्चे इसे चाव से खाते है। देश के पारम्परिक चिकित्सक बताते है कि इसके मौसमी प्रयोग से वर्ष भर बीमारियो से बचा जा सकता है। अब आपको महंगे रिशी मशरूम और नोनी जैसे उत्पाद पर व्यर्थ पैसे बहाने की क्या जरुरत?
मैने देशी फलो के महत्व पर सैकडो आलेख लिखे है और एक वृहत एनसाइक्लोपीडीया तैयार की है। देश भर मे साल भर देशी फल उपलब्ध है। आप अपने इलाके का नाम बताइये और हम आपको बतायेंगे आपके आस-पास पाये जाने वाले देशी फल, उनके स्थानीय नाम, उनके औषधीय महत्व और साथ ही इस विषय मे जानकारी रखने वालो की सूची। - इस तर्ज पर इसे तैयार किया गया है। मुझे लगता है कि आने वाली पीढी के लिये यह अधिक उपयोगी होगा क्योकि यह हमारा सौभाग्य है कि वर्तमान पीढी इनके विषय मे कम ही सही पर उपयोगी जानकारी रखती है। उन्हे फिर से जगाने की जरुरत है जिससे देशी फल भारतीय घरो मे एक फिर पहुँचे। बच्चे यदि इन्हे खाने की मेज पर देख ले तो समझिये हमने एक पूरी पीढी तक यह सन्देश पहुँचा दिया।
(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)
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