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आइये ऐसे करे पारम्परिक नुस्खो को समृद्ध
 पंकज अवधिया
केवाँच और गोखरू के बीजो के चूर्ण को बराबर मिलाकर गाय के धारोष्ण दूध के साथ सेवन मनुष्य की शक्ति को कभी क्षीण नही करता है। ऐसा प्राचीन चिकित्सा ग्रंथो मे लिखा है। इसे स्वयमगुप्तादिचूर्णम का नाम दिया गया है। ग्रंथो मे इससे अधिक जानकारी उपलब्ध नही है। इस जानकारी के साथ जब मै छत्तीसगढ के पारम्परिक चिकित्सको से मिला तो उन्होने अपनी अलग-अलग प्रतिक्रियाए दी।
ज्यादातर पारम्परिक चिकित्सक इस नुस्खे को जानते है। दोनो ही वनस्पतियाँ राज्य मे मिलती है और वे सैकडो नुस्खो मे इन वनस्पतियो का प्रयोग अन्य वनस्पतियो के साथ करते है। पर बहुत से पारम्परिक चिकित्सक इन दो वनस्पतियो के प्रयोग ही को उपयोगी मानते है।
मैदानी भाग के पारम्परिक चिकित्सको ने बताया कि वे केवाँच के काले बीजो वाली किस्म का प्रयोग करते है। जमीन मे गिरे या कहे बिखरे हुये बीजो का एकत्रण है। खेती से तैयार बीजो का प्रयोग नही होता है। बागबहरा के पारम्परिक चिकित्सको ने बताया कि वे सफेद, काले और मिले-जुले बीजो का प्रयोग करते है।
गोखरू के बीज नदी के किनारे पर अपने आप उगने वाले पौधो से एकत्र किये जाते है। महानदी की रेत मे उगने वाले गोखरू को सबसे अच्छा माना जाता है। वे पारम्परिक चिकित्सक जो महानदी से दूर है, वे घूम-घूम कर वनस्पति बेचने वालो से इसे खरीद लेते है। मेलो से भी इसकी खरीद होती है।
क्या साल भर इसका प्रयोग करना चाहिये? यह जानकारी सन्दर्भ ग्रंथो मे नही मिलती है। पारम्परिक चिकित्सक बताते है कि बरसात और जाडे के मौसम मे इसका प्रयोग करना चाहिये। बरसात मे इसे भैस के दूध के साथ जबकि जाडे मे गाय के दूध के साथ लेना चाहिये।
पारम्परिक चिकित्सक पहले केवाँच की मात्रा अधिक रखते है फिर धीरे-धीरे गोखरू की मात्रा बढाते जाते है। वे इस नुस्खे का प्रयोग सहायक उपचार के रूप मे उन रोगियो की चिकित्सा मे करते है जिनकी प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है। वे कहते है कि आरम्भ मे इसका प्रयोग मुख्य उपचार मे भी होता है। आधुनिक चिकित्सा जब हार मान लेती है और एडस के रोगी को मरने के लिये छोड दिया जाता है तब वे पारम्परिक चिकित्सको के पास आते है। कई पारम्परिक चिकित्सक इस अवस्था मे इस नुस्खे के प्रयोग की बात कहते है पर वे इसमे 20 प्रकार की अन्य वनस्पति भी मिला लेते है।
काँकेर के पारम्परिक चिकित्सक जब किडनी रोगो का उपचार करते है तो इस नुस्खे मे गोखरू का अनुपात बढा देते है। पार्किंसंस जैसी बीमारियो के इलाज मे केवाँच का अनुपात बढा दिया जाता है। उनका कहना है कि मुख्य भूमिका केवाँच की होती है और गोखरू का प्रयोग केवाँच के असर को बढा देता है। दूध केवल माध्यम का कार्य नही करता है। यह केवाँच और गोखरू दोनो ही की क्षमता को बढा देता है।
इन जानकारियो को जब मैने विस्तार से लिखना आरम्भ किया तो इसे समाहित करने मे 350 से अधिक पृष्ठ लगे। राज्य मे 6000 से अधिक पारम्परिक चिकित्सको को मै जानता हूँ। इनमे से कुछ से मिलने पर इस नुस्खे के विषय मे इतनी जानकारी मिली। देश भर के पारमपरिक चिकित्सको से कितनी जानकारी मिल सकती है यह कल्पना से बाहर है। ये जानकारियाँ बहुत महत्वपूर्ण है। मुझे लगता है कि इन्हे प्राचीन ग्रंथो के नवीन संस्करण के शामिल किया जाना चाहिये। ऐसी ही जानकारियाँ दस्तावेजो के रूप मे उपलब्ध पारम्परिक ज्ञान को समृद्ध बना सकती है। पिछले एक दशक से भी अधिक समय से मै यह कार्य कर रहा हूँ और अब तक हजारो नुस्खो के विषय मे जानकारी एकत्र की है। पर यह ज्ञान बहुत वृहत है। यही कारण है कि अभी तक मै केवल 38 नुस्खो मे नयी जानकारियाँ जोड पाया हूँ। आज सारी दुनिया पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान जैसे नीरस विषय के बारे मे जानने को तैयार नही है। ऐसे मे चिंता और बढ जाती है। इस विषय मे नयी पीढी को बताकर यदि एक विश्वविद्यालय की स्थापना की जाये तभी इसका भविष्य सुनहरा कहा जा सकता है।
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(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)
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