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पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान के दस्तावेजीकरण के दौरान हो रहे विचित्र अनुभव-1
 पंकज अवधिया
मै वानस्पतिक सर्वेक्षण के लिये तैयार हो ही रहा था कि सुबह-सुबह फोन आ गया। यह फोन अमेरिका से था। “ आप ही मेरे अंकल को बचा सकते है।“ यह आवाज एक भारतीय की थी। उनका कहना था कि उनके अंकल किसी वनस्पति का सेवन करते थे लम्बे समय तक और इसी कारण उनकी तबियत बिगड गयी है और वे दिल्ली मे भरती है। लीवर और किडनी खराब हो गयी है। यदि आप उपचार बतायेंगे तो दिल्ली के चिकित्सक आपको पूरा सहयोग करेंगे।“ मैने एक पल सोचा फिर मदद करने की ठानी। मैने उनसे कहा कि मै कृषि वैज्ञानिक हूँ और मुझसे जो बन पडेगा मै करूंगा। मुझे इलाज करना नही आता। पर फिर भी मै आपकी तसल्ली के लिये उन चिकित्सको से बात कर सकता हूँ। उधर से जवाब आया कि आप वनस्पति की पहचान बता दे। उन्होने तस्वीर भेज दी। साथ मे प्रश्नो की एक लम्बी सूची भी। यह तो पूछा ही गया था कि इस वनस्पति से होने वाली हानियो को कैसे दूर करे? साथ ही यह भी जानकारी माँगी गयी थी कि यह देश मे कहाँ मिलती है? इसे कैंसर की चिकित्सा मे कैसे उपयोग करते है? भला इन प्रश्नो का अंकल की तबियत से क्या वास्ता? सन्योग से जिस अस्पताल का नाम बताया गया था वहाँ मेरे मित्र काम करते थे। उनको फोन किया तो तस्वीर साफ होने लगी। बताये गये नाम का कोई व्यक्ति अस्पताल मे भर्ती नही था। जिस चिकित्सक का नाम बताया जा रहा था उस नाम से भी वहाँ कोई नही था। अमेरिका के फोन नम्बर के आधार पर जब इंटरनेट पर खोज की तो पता चला कि वो महाश्य एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय मे शोध करते है, वह भी जडी-बूटियो पर। उन्होने जो सन्देश भेजा था वह विश्वविद्यालय का न होकर सामान्य आई.डी.था। मैने उन्हे जवाब नही दिया। एक दिन मे कई सन्देश आते रहे फिर एक सन्देश आया ‘आपके अनदेखा करने के कारण अंकल गुजर गये। आपने यह ठीक नही किया। अभी भी प्रायश्चित की गुन्जाइश है। यदि आप पूरी जानकारी दे दे तो आपको माफ किया जा सकता है।‘ मैने सिर्फ एक काम किया और वह यह कि उसकी ई-मेल आई.डी. को ब्लाक कर दिया। मरीज बनकर रोज दसो लोग मुझसे पारम्परिक ज्ञान से सम्बन्धित जानकारी पाना चाहते है और इसी फेर मे कई बार असली रोगी मेरे तल्ख रवैये के शिकार हो जाते है।
यह बडे ही आश्चर्य की बात है कि भारतीय वनस्पतियो पर मेरे लेखो को सबसे अधिक विदेशो मे पढा जाता है और अधिक पत्र भी वही से आते है। वे आलू की सब्जी से लेकर रुद्राक्ष तक की जानकारी माँगते है। अब ई-मेल से तो पता नही चलता कि जरुरतमन्द सही है या व्यवस्सयिक उपयोग के लिये यह जानकारी माँग रहा है। हो सकता है वह मरीज बनकर माँगी जा रही जानकारी से कोई पेटेण्ट ले ले। इसलिये मै उनसे कहता हूँ कि आप राष्ट्रीय जैव-विविधता बोर्ड के पास जाकर अनुमति माँगे और फिर उनके कहने पर मै जानकारी देने का प्रयास करूंगा। पर ज्यादातर लोग यह रास्ता नही अपनाते है। एक उदाहरण देता हूँ। पिछले सप्ताह अमेरिका के एक लेखक ने मुझे लिखा कि मै उसे अकरकरा नामक वनस्पति के विषय मे जानकारी दूँ। मैने उससे कहा कि आप बोर्ड से अनुमति ले ले। इसके बाद एक और सन्देश आया मलेशिया से। उसमे कहा गया कि हमे इसके बीज चाहिये। मैने वही बात दोहरायी। अगला सन्देश दिल्ली से आया कि हमे अकरकरा की जानकारी दे। अब देश के अन्दर तो जानकारी दी जा सकती है। पर इसके व्यव्सायिक उपयोग की बात सोचते हुये मैने फिर वही बात दोहरायी। अगला सन्देश नागपुर से आया। यह किसी प्रोफेसर का था। लीजिये अब तो आपके ही क्षेत्र का व्यक्ति आपसे जानकारी माँग रहा है। मैने उनसे कहा कि आप यह लिख कर दे दे कि जानकारी का उपयोग व्यवसायिक तौर पर नही करेंगे क्योकि यह देश का पारम्परिक ज्ञान है तो कोई जवाब नही आया। अगला सन्देश नही आया बल्कि मेरे ही शहर का एक शोधकर्ता इसी जानकारी के लिये घर पहुँच गया। साथ मे मेरे एक रिश्तेदार को भी ले आया। अब बताइये। आप कहाँ तक बचेंगे? दरअसल मै कैसर की पारम्परिक चिकित्सा पर एक रपट तैयार कर रहा हूँ। अकरकरा उसमे है यह तो लोग जानते है पर इसके उपयोग की जानकारी कूट शब्दो मे है। यही कारण है इस लम्बी मशक्कत का। यह विडम्बना ही है कि अपने खर्च पर पारम्परिक ज्ञान का दस्तावेजाकरण कर रहे व्यक्ति को प्रोत्साहन तो दूर कोई इस तरह भारी दबाव से बचाने भी सामने नही आ रहा है। रिश्तेदार ने देखा कि मुझ पर असर नही हो रहा तो पिता जी से बोले कि मैने सामने वाले को जबान दे दी है। अब जानकारी नही मिली तो रिश्ता भी खतरे मे पड सकता है। इस दबाव से अब मै यह पता लगा रहा हूँ कि आखिर कौन है जो इतना साधन सम्पन्न है और जिसे जानकारी की इतनी आवश्यकता है। वह जो भी है उसे सीधे रास्ते से जानकारी नही चाहिये। नही तो वह बोर्ड के पास जाये और विधिवत तरीके से काम करे।
ऐसे विचित्र अनुभवो की लम्बी सूची है मेरे पास। अगले लेखो मे मै इस विषय मे और लिखूंगा। मुझे लगता है कि इस लेख से इस विषय मे कार्य करने की इच्छा रखने वाले नये शोधकर्ताओ को कुछ समझने और सीखने मिलेगा और वे इन दबाओ से बच सकेंगे।
सम्बन्धित हिन्दी आलेख
(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)
© सर्वाधिकार सुरक्षित
Comments
Ghanshyam Soni
06 Mar 2008, 03:43
apki rah ke kante videshi bhi hai, aur deshi bhi, parantu takliph is baat
ki hai ki deshi kante jyada peeda dete hai, paramparik chikitsakiya gyan ko
hadapne ki videshi chalo se kuch jyada hi sabdhan rahne ki jarurat hai.
Isme amerikiyo ke patent par peni nazar rakhne ke liye sarkar ko alag
department band dena chahiye
भुवनेश
06 Mar 2008, 23:44
वाकई लोग
दूसरे की
मेहनत का
बेजा फायदा
उठाना चाहते
हैं.
आपकी
प्रशंसा
करता हूं कि
इस प्रकार के
दबावों के
बावजूद आप
अपना काम
ईमानदारी से
कर रहे हैं.
Bipin Kr. singh
26 Apr 2008, 07:16
I am very pleased to read your article and thanks for your sincere effort
regarding this. Please save it and save our knowledge from the our enemy.
Many many thanks.
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