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आपको स्वस्थ बनाने बाट जोह रहे है देशी फल
आइये ऐसे करे पारम्परिक नुस्खो को समृद्ध
कितना कम जानते है हम देश की पर्यावरणीय सम्स्याओ के विषय मे
और अब बम भी होने चाहिये हर्बल
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किसान और इंटरनेट

आपके प्रश्न मेरे उत्तर

पंकज अवधिया

प्रश्न: आपने इंटरनेट पर किसानो के लिये उनकी अपनी भाषा मे लिखना आरम्भ किया है। आपके सैकडो हिन्दी लेख पीडीएफ के रूप मे पहले से ही उपलब्ध है। क्या आपको लगता है कि ये किसानो तक पहुँच पायेंगे?
उत्तर: भले ही वर्तमान मे इंटरनेट आम किसानो से दूर है पर जल्दी ही यह किसानो के लिये उपयोगी साबित होगा। मेरे किसानोपयोगी लेख सबसे अधिक गुजरात, पंजाब और हरियाणा के किसान पढते है। देश के दूसरे हिस्सो मे किसानो के बीच काम कर रही संस्थाओ के माध्यम से लेख किसानो तक पहुँचते है। मेरा अनुमान है कि अगले पाँच वर्षो मे बडा परिवर्तन आयेगा और किसान बडी संख्या मे इंटरनेट का उपयोग करेंगे। पर उसके लिये इंटरनेट मे जानकारियो का अम्बार लगाना होगा। अभी किसानो की अपनी भाषा मे जानकारी नही है। आज किसानो के बीच कृषि पत्रिकाए लोकप्रिय है पर ये पत्रिकाए क्षेत्रीय है और उसमे बहुत कम सामग्री होती है। आम तौर पर विशेषज्ञ उसमे एक ही तरह के लेख साल दर साल लिखते रहते है। इंटरनेट मे दुनिया भर की जानकारी है और विशेषज्ञ भी उपलब्ध है। कल ही की बात है मुझे एक सजावटी पौधे मे कुछ कीडे मिले। किसान ने पूछा कि इसके लिये क्या दवा डाले? मैने कीडे का चित्र लिया और पेस्टनेट नामक याहू ग्रुप मे भेजा। झट से दुनिया भर के वैज्ञानिको ने न केवल कीडो की पहचान की बल्कि सस्ता उपाय भी सुझा दिया। आज मैने इसे किसान तक पहुँचा दिया नि:शुल्क। मेरे ज्ञान मे भी इजाफा हुआ और किसान की समस्या भी सुलझ गयी। किसान चकित था। उसे लग रहा था कि एक महिने तो लगेंगे ही।

प्रश्न: क्या आप अभी भारतीय किसानो के लिये इंटरनेट पर उपलब्ध जानकारी को पर्याप्त मानते है?
उत्तर: जैसा कि मैने पहले कहा, नही। हम लोग उसी की तैयारी मे लगे है और यही वैज्ञानिक समुदाय का छोटा सा योगदान है समाज को। ये प्रयास अभी बेकार लग सकते है पर किसानो के बडी संख्या मे आने पर उनकी सतुष्टि से सारी मेहनत वसूल हो जायेगी। यह कटु सत्य है कि अभी कम लोग ही जानकारी उपलब्ध करने के प्रयास मे लगे है पर उम्मीद है इन प्रयासो से और लोग भी सामने आयेंगे।

प्रश्न: आप गूगल और याहू जैसे खोजी इंजनो के विषय मे कुछ कहना चाहेंगे?
उत्तर: बिल्कुल कहना चाहूंगा। इतने अपार संसाधन होते हुये भी विज्ञान के क्षेत्र मे मै इन्हे दस मे एक अंक से अधिक नही दे सकता। अभी उपलब्ध जानकारियो को सही तरीके से उपलब्ध कर वे किसानो से लेकर वैज्ञानिको सभी की मदद कर सकते है और धनार्जन भी कर सकते है। यह विडम्बना ही है कि ये अपनी टीम मे कम्प्यूटर मे दक्ष लोगो को रखते है पर जिनके लिये ये उत्पाद बना रहे है उनकी सुनते भी नही है। सब को साथ लेकर चलने ही से वे अपने अलावा पूरे समाज का भला कर सकेंगे।

प्रश्न: जडी-बूटी के क्षेत्र मे कैसे इंटरनेट अहम भूमिका निभा सकता है?
उत्तर: इस क्षेत्र मे इंटरनेट अभी भी अहम भूमिका निभा रहा है। बहुत से पढे-लिखे किसान या उनकी संताने अब जडी-बूटियो के अंतरराष्ट्रीय बाजार से जुडने की कोशिश कर रहे है। इन किसानो के विषय मे जानकारी पाकर अब क्रेता व्यापरियो की बजाय किसानो से सीधे मिल रहे है। उन्हे एक तो सही उत्पाद मिल जाता है फिर मध्यस्थो का कमीशन नही देना होता है। जडी-बूटियो की पहचान मे भी इंटरनेट की अहम भूमिका है। मै एक सफल प्रयोग बताता हूँ। हमारे विशेषज्ञ किताबो मे लिखी बातो को ब्रम्ह वाक्य मानते है और नयी वनस्पतियो के अस्तित्व की बात होने पर यदि इसका उल्लेख किताबो मे नही मिलता तो उसे नकार देते है। पिछले कुछ वर्षो से मै पारम्परिक चिकित्सको को इंटरनेट की सहायता से दुनिया भर के डेटाबेस से पौधे दिखाता हूँ। उनमे से कुछ को वे झट से पहचान जाते है और उनकी उपस्थिति पर मुहर लगा देते है। इस तरह इन वनस्पतियो की उपस्थिति को मान्यता मिल जाती है। यह विडम्बना ही है कि हमारे देश के योजनाकार जडी-बूटियो को बचाने अरबो बहा रहे है पर यह जानने की कोशिश नही कर रहे है कि कौन-कौन सी जडी-बूटियाँ वास्तव मे संरक्षण की मोहताज है?

मै तो उस दिन का भी स्वप्न देखता हूँ जब दुनिया भर के किसान और पारम्परिक चिकित्सक इंटरनेट की सहायता से एक मंच पर आयेंगे और अपने फैसले खुद करेंगे।

इंटरनेट पर किसानोपयोगी जानकारियाँ देने वाली कुछ कडियाँ:

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